Home > OBI > HIV / AIDS care > सुरंग के अन्त में ज्योति दिखाई पड़ी

वह एक अनाथ लड़की थी क्योंकि उसके माता-पिता दोनों की एच.आई.वी के कारण मृत्यु हो चुकी थी। उस समय वह केवल 4 महीने की थी। उस समय प्रियाँका एक दम अकेली रह गई थी और उसे किसी का भी सहारा नहीं था। उसके बूढ़े दादा ढाऊँडे राव के सिवा उसके परिवार का कोई भी सदस्य नहीं था। उनके पास कोई और उपाय नहीं था सिवा इसके कि वे प्रियाँका की देखभाल करें। लेकिन वे स्वयं को असहाय अनुभव करते थे क्योंकि उनके पास कमाने का कोई साधन नहीं था। अब वह पहले के समान पैसे नहीं कमा पाते थे इस लिए वह अपनी सामान्य ज़रूरतों को भी पूरा नहीं कर पाते थे।

Priyanka_EYE-HIV-Homeएक दिन प्रियाँका बिमार पड़ गई। उसे तेज़ बुखार था और उसके दादा उसे सरकारी अस्पताल में ले गए थे। जाँच करने पर पता चला कि वह भी एच.आई.वी. के रोग से ग्रसित थी। यह बात प्रियाँका के दादा के लिए एक बड़ा आघात था। वह पूरी तरह से निराश हो गए थे और उनका दिल टूट गया था क्योंकि वह इस लायक नहीं थे कि अपनी पोती का उसके रोग के अनुसार इलाज करा सकें। अस्पताल के डॉक्टर ने उनकी कठिन परिस्थिति को समझा और उन्हें सलाह दी कि वे ऑपेशन ब्लेसिंग इन्डिया और उनके सहायकों से समपर्क करें जो एक अनाथालय चलाते थे जहाँ पर एच.आई.वी. ग्रसित बच्चों की देखभाल की जाती थी। प्रियाँका के दादा यह सुन कर बहुत खुश हुए कि वहाँ रहने के साथ-साथ उनकी पोती पढ़ भी सकती है क्योंकि उन बच्चों के लिए उन को अनाथ आश्रम की सीमा के अन्दर ही था। अकसर एच.आई.वी. ग्रसित लोगों का दूसरे लोगों के द्वारा तिरस्कार ही होता देखा गया है और इस का प्रभाव ऐसे बच्चों पर अच्छा नहीं पड़ता है। यहाँ तक कि उनको स्कूलों में प्रवेश भी नहीं दिया जाता है। वे स्कूल में केवल परीक्षा देने के समय ही जा सके हैं। इस लिए प्रियाँका और उसके जैसे अन्य बच्चे अनाथ आश्रम के अन्दर ही बैठ कर पढ़ाई करते थे।

Priyanka_EYEHIV2प्रियाँका के स्वास्थ्य की समस्याएँ जिन में खाँसी, ज़ुखाम और दूसरी कमज़ोरियों के साथ-साथ उसकी नज़र भी कमज़ोर हो गई थी। उसे साफ से दिखाई नहीं देता था। इसलिए उसे अपनी किताबें पढ़ने में परेशानी होती थी। फिर उसे एक स्वास्थ्य शिविर में ले जाया गया।
वहाँ पर डॉक्टर ने उसकी आँखों की जाँच करने के लिए भेज दिया। आँखो के डाक्टर ने पाया की उसकी नज़र सीधी आँख में 0.75 और 180 डिगरी के कोण पर थी और उसकी उलटी आँख 1.00 तथा 180 डिगरी के कोण पर थी। जाँच के बाद डॉक्टर ने उसे एक नया चश्मा दे दिया था जिसके द्वारा अब वह सब कुछ साफ-साफ देख सकती थी। ओ.बी.आई.

के दल ने उसे कुछ दवेँ भी दी थीं। और यह सब कुछ निशुल्क था। प्रियाँका के दादा बहुत खुश थे क्योंकि प्रियाँका की देखभाल बहुत ही अच्छे तरीके से की जा रही थी। इसके लिए वे ओ.बी.आई. के आभारी हैं। जब उन्होंने प्रियाँका का पञ्जीकरण उस अनाथ आश्रम में कराया था तब उन्होंने कहा था कि, “ऐसा कोई भी नहीं है जो मेरी पोती की ऐसी, और हर तरह से देखभाल कर सके। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि वे मुझे यहाँ ले कर आये थे। मैं आश्वस्त हूँ क्योंकि यही प्रियाँका के लिए सही जगह है।” प्रियाँका भी इस वातावरण में अच्छी तरह से घुल-मिल गई है। उसने कहा था, “अब मैं यहाँ रक्षा दीपम में कक्षा 2 में पढ़ती हूँ और यहीं पर रहती भी हूँ। मुझे यहाँ सब के साथ रहना अच्छा लगता है। मैं अनुभव करती हूँ मानो मैं अपने परिवार के साथ रहती हूँ।”

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