Home > OBI > Health Care > चारी ने जीने का नया अवसर पाया

चारू एक ब्राह्मण परिवार से सम्बन्ध रखती था। उसके पिता राघवाचार्य महानकाली मन्दिर में एक पुरोहित थे। जो सिकन्द्राबाद में बालमराई के पास स्थित है। वे वहाँ के अनेक पुजारियों में से एक थे। जब चारी तीन साल का था तभी उसके पिता की एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। और कुछ साल पहले उसकी माँ का भी देहान्त हो गया था। चारी बचपन से ही शारीरिक रूप से अपाहिज था। वह लंगड़ा कर चलता था। पैसे की कमी के कारण वह केवल सातवीं कक्षा तक ही पढ़ पाया था। घर की आर्थिक स्थिति को देख कर उसे एक होटल में मेज़ साफ करने का काम करना पड़ा था। और वह 9 साल तक वहां पर काम करता रहा। परन्तु बाद में उसने वह काम छोड़ दिया और मन्दिर में काम करने लगा। उसने सारे श्लोक सीख लिए और मन्त्रों का उच्चारण करना भी सीख लिया था। अब वह महानकाली मन्दिर में काम करने लगा जो तरनाका में स्थित था और अब वह हर महीने 10,000  रुपये कमाने लगा था।

फिर उसकी शादी हो गई और बाद में उसे आशीष मिली और वह एक बेटे का पिता बन गया। लेकिन जन्म के कुछ ही महीने बाद एक दुर्घटना में उसके बेटे की मृत्यु हो गई। इस घटना ने उसे और उसके परिवार को तोड़ कर रख दिया था। इतना ही नहीं चारी एक दिन ऐसा गिरा कि उसे लकवा मार गया था। इस कारण उसका जीवन एक नाटकीय ढँग से पूरी तरह से बदल चुका था। इसके गम्भीर परिणाम देखने को मिले। अब चारी की पत्नी को जबरन काम करने जाना पड़ा जिससे घर की ज़रूरतें पूरी की जा सकें। पर उसकी पत्नी इतना धन नहीं कमा पाती थी जिससे घर का खर्च चल सके। और न ही वह उस अतिरिक्त काम के बोझ को उठा पाती थी जो उसे अपने पति की, जो हर समय बिस्तर पर पड़ा रहता था उसकी देखभाल करने के लिए ज़रूरी था। फिर एक दिन वह चारी को छोड़ का भाग गई। अकेला रह जाने पर चारी अपने लिए कुछ भी करने में असमर्थ था। तब चारी जाकर अपने एक चाचा के घर पर रहने लगा। फिर एक दिन उसके पेट में भयंकर दर्द हुआ और वह असहनीय था। उसे शराब पीने की लत लग चुकी थी इस लिए उसकी हालत दिन ब दिन बिगड़ती चली जा रही थी। तब चारी के चाचा ने उसे एक सरकारी अस्पताल में भरती करा दिया और फिर कभी उसकी सुधी लेने नहीं गए। तब चारू गरीबी और अभाव की अवस्था में सरकारी अस्पताल के सामने की सड़क का निवासी बन कर रह गया था। वह वही खाता था जो आते-जाते लोग उसे दे देते थे।

ऐसी ही अवस्था में ऑपरेशन ब्लेसिंग इन्डिया और राज आसरा होम जो गरीब और ज़रूरतमन्द लोगों की भोजन कपड़े और रहने के स्थान देकर उनकी सहायता करते थे उनके आश्रम में रहने वाले एक गरीब व्यक्ति ने चारू को सड़क पर असहाय पड़ा पाया। वह उसे उठा कर गरीब लोगों के आश्रम में ले गया। चारी उस आश्रम में आकर बहुत खुश था परन्तु उसका स्वास्थ्य पहले के समान उसे दुख देता था। उसके पेट की पीड़ा और भी बढ़ गई थी और वह असहनीय हो चुकी थी। उसके पेट में एक गाँठ बन चुकी थी जिस का आकार एक गेंद के बराबर था। और वह भयंकर पीड़ा से लड़ रहा था। तब ओ.बी.आई का एक दल उसे अस्पताल ले गया जिससे उसकी सही जाँच कराने के बाद उसका सही से इलाज किया जा सके।

जाँच के बाद पता चला कि चारी को हर्निया की शिकायत थी और क्योंकि उसकी हालत बहुत खराब थी इसलिए उसके लिए तुरन्त ऑपरेशन करने का आयोजन किया गया। तब ओ.बी.आई. के दल ने उसका निशुल्क ऑपरेशन भी करवा दिया। इसके अतिरिक्त ऑपरेशन के बाद की दवाओं तथा अन्य खर्चे भी ओ.बी.आई. ने उठा लिए थे। जितने दिन चारी अस्पताल में था उसका सारा खर्च भी ओ.बी.आई. के दल ने भरा था। ऑपरेशन सफलता पूवर्क कर दिया गया था और उसके पेट वह गाँठ निकाल दी गई थी। अब चारी का स्वास्थ्य धीरे-धीरे सुधरने लगा था। अब वह आश्रम में आ चुका है और हर दिन सामर्थ से भर रहा है।

चारू का कहना है कि ओ.बी.आई. ने सही समय पर उसे आश्रम में आश्रय दिया था नहीं तो वह आज भी सड़क पर जीवन बिता रहा होता जहाँ मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। यह तो केवल ओ.बी.आई. के प्रेम और गरीबों की ज़रूरतें की पूर्ति के कारण ही सम्भव हो सका कि मेरा सही से इलाज हो सका और मैं आज जीवित हूँ। अब मेरे पास एक घर है, एक परिवार है जो मेरी चिन्ता करता है। ओ.बी.आई. का लाख-लाख धन्यवाद हो।

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