Home > OBI > Disaster Relief > रतन भाई – दुगनी आशीष

ओ.बी.आई. ने गुगूस के निकट एक शिविर का आयोजन किया था जो कि गुजरात का एक दूर अन्देश गाँव था। रतन भाई और उसकी बेटी उन बहुत से लोगों में शामिल थे जिन्होंने भी इस शिविर से लाभ उठाया था। रतन अपने घर का अकेला कमाने वाला था। और उसकी पत्नी घर की देखभाल करती थी। उसके पास दो भैंसे थीं जिन का दूध बेच कर वह अपना खर्चा चलाता था। वह उससे बहुत ही थोड़ी सी कमाई कर पाता था। और उस कमाई से Ratan-Bhai-LHउसके लिए अपने घर का खर्चा चलाना बहुत कठिन था। रतन चाहता था कि वह अपने परिवार और पत्नि को एक बेहतर जीवन दे सके। लेकिन उनकी परिस्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा था।

इस दुख में एक और दुख मिल गया था और उसकी परिस्थिति और भी बिगड़ गई थी जब पेट की एक अनजावी बिमारी से उसके बेटे की मृत्यु हो गई थी। वे बहुतत ही चकित और उलझन में थे और उन को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उनके बेटे को क्या हुआ था। अपने दर्द और चिन्ता को छुपाते हुए रतन ने हर कोशिश की कि किसी तरह से अपनी पत्नी को सांत्वना दे। पर दो दिन बाद ही उसकी बेटी को वह वही पेट की पीड़ा सताने लगी जैसी पीड़ा की शिकायत उनका बेटा करता था। तब रतन और उसकी पत्नी और भी चिन्तित हो गए थो। और उनको डर लगने लगा था कि कहीं वे अपनी बेटी को भी खो न दें। उन्होंने हर मुमकिन कोशिश की और उसे एक अच्छे डॉक्टर को भी दिखाया था क्योंकि कुछ भी हो जाए वे अपनी बेटी को बचाना चाहते थे। उन्होंने अपनी भैंसे भी बेच दीं जो उनकी कमाई का एकमात्र साधन था। फिर उन्होंने अपने घर कोक भी गिरवी रख दिया था जिससे उनकी बेटी के इलाज में पैसों की कोई कमी न हो। ऐसा सब करने के बाद भी उनकी बेटी का दर्द बढ़ता रहा और उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी। अब उसके परिवार के लोग भी उसका तिरस्कार करने लगे थे। और उनकी ज़रूरत के समय कोई भी उनकी सहायता के लिए आगे नहीं आ रहा था। Ratan-Bhai-LH1इसके स्थान पर वे उनकेक परिवार को एक श्रापित परिवार कहने लगे थे और उनको अपने से अलग और दूर कर दिया था। अब वे गाँव के किसी भी उत्सव में भाग नहीं ले सकते थे।

इस कठिनाई के समय में रतन ने ओ,बी,आई, के निशुल्क स्वास्थ्य शिविर के बारे में सुना था जिसका आयोजन पास के गाँव में किया जा रहा था। एक बड़ी आशा के साथ रतन अपनी बेटी के साथ उस शिविर में गया था। जाँच करने पर ओ.बी.आई. के डॉक्टर ने पाया कि उसके पेट में सूजन थी। इस पर डॉक्टर ने उसका स्कैन लेने की सलाह दी। तब रतन इलाज कराने से कुछ हिचकिचा रहा था क्योंकि उसे उसके खर्च की चिन्ता थी। पर उसने हिम्मत करके ओ.बी.आई. से साफ-साफ अपनी परेशानी बता दी। ऐसे में ही ओ.बी.आई.उन गरीब लोगों के सहायता के लिए खड़ी हो जाती है, उसकी परिस्थिति को जान कर ओ.बी.आई. ने ही उसकी बेटी का इलाज करने की ज़िम्मेदारी खुद पर ले ली थी। स्कैन होने के बाद ओ.बी.आई. ने पूरा ध्यान रखा कि उसको सारी दवाएँ ओ.बी.आई. की फार्मेसी से ही दिला दी थीं। रतन की परेशी को समझते हुए .बी.आई. एक कदम आगे बढ़ाया था। उसने रतन को दो बकरियाँ ले दीं जिससे वे अपने घर का खर्च चला सके। रतन को बड़ा ही आराम मिला जब उसने देखा कि ओ.बी.आई. सही समय पर उसकी बेटी का सारा इलाज करवा रही थी। वह और उसकी पत्नी ओ.बी.आई. की इस सदभावना से बहुत ही प्रभावित थे जिस ने उनके जीवन में आशाएं भर दी थीं। उन्होंने कहा था कि ओ.बी.आई. तो उनके जीवन के लिए लिए दुगनी आशीष बन गई थी। हम आभारी है कि उन्होने हमारी न केवल बेटी की चंगाई दिलाने में वरन हमें रोज़ की रोटी कमाने में भी सहायता की है।

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