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बक्शुपल्ली में सामान्य स्थिति

“क्या मैं इन टूटी हुई दीवारों को जोड़ कर अपना घर बना सकती हूँ?” थोटम्मा ने चिल्ला कर कहा था। उस समय जब आँध्र प्रदेश और उड़ीसा के तट पर फायलिन नामक बवंडर ने हज़ारों लोगों के जीवनों को तहस-नहस कर दिया था। ये स्थान जहाँ तेज़ बारिश और 150 किलो मीटर से भी तेज़ हवाओं ने सैंकड़ों पेड़ों को जड़ से उखाड़ फेंका था और घरों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया था तथा और जो कुछ भी उन तूफानी हवाओं के रास्ते में आया था उसे उड़ा ले गई थीं। आज वहाँ पर घरों के टूट जाने से बहुत से लोग बेघर हो गए हैं और उनके सर पर छत नहीं है। हज़ारों लोगों के पास कुछ भी नहीं बचा है सिवा उन कपड़ों के जो वे पहने हुए थे जब वे अपनी जान बचा कर भागे थे।

45 साल के थोटम्मा और उसके पति थाटिया उड़ीसा में गनजाम ज़िले में गोपाल पुर के पास नई बक्शुपल्ली में रहते थे। जिन को 12 अक्तूबर 2013 को वहाँ से हटा कर एक सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया था परन्तु जब वे दूसरे लोगों के साथ अगले दिन अपने घर को देखने गए थे तब उन्हों ने वहाँ पर कुछ नहीं पाया था। उनके मट्टी के घर टूट चुके थे और जो कुछ भी सामान भीतर रखा था वह वह गया था।

Thotamma_DRसब से दुख की बात यह थी कि थोटाम्मा के पति थाटिया एक अपाहिज व्यक्ति थे परन्तु फिर भी वे मछली पकड़ने जाते थे और घर के लिए थोड़ी बहुत कमाई कर लेते थे। इस हादसे ने उसके दिल पर इतना गहरा असर किया कि वह निराशा में डूब गया था। इस विनाश ने उसे इतना दुखी कर दिया था कि अब वह कोई भी काम नहीं करना नहीं चाहता था। अब तो वह अपने टूटे घर को भी फिर से बनाने में सहायता नहीं करना चाहता था। थोटम्मा दैनिक मज़दूरी करती थी और उसकी पूरी कोशिश रहती थी कि घर का खर्च चला सके क्योंकि वह जानती थी कि अब उसका कोई और सहारा नहीं है जो कमाई कर सके। वह जो कुछ भी कमाती थी वह उसका घर चलाने के लिए काफी नहीं होता था। उसकी एक ही बेटी थी जिसकी शादी हो चुकी थी और वह किसी दूसरे गाँव में रहती थी। उसके पति कीक मानसिक स्थिति भी बिगड़ चुकी थी और वह बहुत चिन्तित थी और नहीं समझ पा रही थी कि अपनी इस असहाय स्थिती से अकेले कैसे निबटे।

Thotamma_DR1ऐसे समय में ऑपरेशन ब्लेसिंग इन्डिया का दल उड़ीसा में राहत कार्य कर रहे थे। उन्होंने पूरे क्षेत्र का निरीक्षण का और उन स्थानों को खोज निकाला जहाँ सब से अधिक नुकसान हुआ था। और जहाँ पर तुरन्त राहत सहायता की ज़रूरत थी। दल ने वहाँ पर एक स्वास्थ्य शिविर का भी आयोजन किया था जहाँ पर थाटिया तथा अन्य रोगियों को इलाज के साथ अन्य स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की गई थी। थोटाम्मा के परिवार के साथ 53 अन्य परिवारों ने भी ओ.बी.आई. से सहायता पाई थी। सभी परिवारों को साड़ियाँ, तौलिए, खाद्य सामग्रियाँ तथा अन्य ज़रूरत के सामान की किट भी पाई थी जिसमें 4 किलो चावल, 1 किलो दाल, 1 किलो तेल, नमक, पिसी हल्दी, मिर्ची, और कपड़े धोने का पाउडर, नहाने का साबुन, कपड़े धोने का साबुन, टूथ पेस्ट तथा तिरपाल की एक चादर शामिल थी। थोटम्मा यह सब पाकर बहुत खुश थी क्योंकि उसे लगता था कि अब वे अपने घर तथा जीवन को एक तरह से सामान्य रूप देने में सफल हो जाएगी।

इस जीवन के सारे कड़वे अनुभवों के बीच भी थोटाम्मा को एक आशा थी कि चाहे ऐसा तुरन्त न हो परन्तु धीरे-धीरे वह और उसका पति एक बार फिर से अपने पैरों पर खड़े हो पाएँगे। बहुत से गाँव वाले ओ.बी.आई. की राहत सहायता के कारण आशीषित हुए थे। और तब उनको लगा था मानो उन पर से एक भारी बोझ उतर गया था। थोटम्मा और थाटिया के साथ गाँव के सभी लोगों ने ओ.बी.आई. का धन्यवाद करके उनके प्रति आभार प्रकट किया था क्योंकि उन्होंने उन की सही समय पर तुरन्त सहायता की थी।

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